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दिल्ली में काले बंदर का आंतक

Monkey Man Allah's words on a brinjal
एक रिपोर्ट- कैसे तर्कवादी ने किया जन उन्माद को काबू
सनल इडामारूकू

मई २०११,नई दिल्ली में सब कुछ धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट आया था | भारत की राजधानी दो सप्ताह से जन भ्रम और आतंक से ग्रसित थी | कभी कभी ये आंतक खतरनाक तरीके से जन उन्माद में बदल जाता है | काला बंदर की छाया अभी भी उपनगरों और शहरी गांवों में अपना अस्तित्व बनाये था | वहाँ अभी भी कुछ लोग थे, जो छोटी छोटी छोटी घटनाओं से उत्तेजित हो जाते थे ,एक छोटी सी आवाज से जाग जाते थे ,एक चीख से रात में हलचल हो जाती थी ,अँधेरे को देख कर डर कर भागने लगते थे ये सारी घटनाएँ कभी भी आदमी को भड़का देने का काम करती थीं और कई बार इस डर के प्रभाव के कारण लोग एक दूसरे को मरने पर उतारू हो जाते थे |लेकिन संकट की सीमा खत्म हो गयी थी | माहौल कुछ हद तक शांत हो गया था | सारी स्थिति पुलिस के नियंत्रण में थी | जीवन फिर से अपनी सामान्य स्थिति मे लौट आया था |

दो सप्ताह पहले भारतीय बुद्धिवादी एसोसिएशन का मुख्यालय मीडिया और लोंगों के बीच केंद्र बिंदु था जो इन रहस्यमय घटना के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था | जो भ्रम की स्थिति सारे जन समुदाय में फैली हुई थी,उसे हम तर्कसंगत और वैज्ञानिक तरीके से जनता को समझाने में सफल रहे जिसके कारण इस संकट को ख़त्म कर सके |

ये घटना मई की है जब सारा शहर भीषण गर्मी की चपेट में था,तभी एक काला बंदर लोंगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए उनके बीच कूद गया | उसके हमलों की अफवाहें जंगल में आग की तरह फैल गयी | दिल्ली और आसपास आतंक का माहौल था | वो सारे अखबार जो दावा करते हैं कि उस काला बंदर को उन्होंने अपने काबू में किया है ,इस खबर से भरे हुए थे | यह आधी रात और४ बजे के बीच रात के अंधेरे में दिखाई देता था , क्योंकि नियमित रूप से इस दौरान लंबे समय तक बिजली की कटौती रहती थी | ये घटना ज्यादातर उन्ही क्षेत्रों में होती थी जहाँ गरीब लोग रहते थे,जो गर्मी से बचने के लिए अपनी छत पर खुली हवा में सोते थे | रात को अचानक आदमी ठन्डे पसीने के साथ उठता था और उसे लगता था किसी ने उसे छुआ है या उसे खरोंचा है | इस दहशत के कारण लोग रोने लगे ,चिल्लाने लगे ,बचने की कोशिश में सीढ़ियों से नीचे भागने लगे यहाँ तक कि कई बार छत से नीचे कूद गये चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था | लोग धक्का मुक्की करने लगे और भगदड़ मच गयी | कुछ लोग गिर कर घायल हो गये | कुछ मामलों में तो लोग गिरने से और छत से कूदने से मर भी गए |

काले बंदर की रिपोर्ट मिलते ही इंडियन रॅशनलिस्ट एसोसिएशन की पूरी टीम घटनास्थल पर पहुंची .ये घटना सितम्बर १९९५ की तरह था ,जब पूरे भारत में हिंदू देवी - देवताओं की संगमरमर की मूर्तियां दूध की प्यासी थी और भगवान् दूध पीने लगे थे | लेकिन इस बार यह एक शांतिपूर्ण चमत्कार नहीं था, इस समय यह एक जनभ्रम था जो जन उन्माद में बदल गया था जिसने कई लोंगों की जिन्दगी ले ली | दूध पीने का चमत्कार एक दिन में थम गया था और दूसरे दिन वैज्ञानिक तरीके से समझाने का मौका भी मिला | हमें कई टीवी चैनलों में मूर्तियों के दूध पीने के पीछे वैज्ञानिक सिद्धांतों की व्याख्या करने का अवसर भी मिला | लेकिन काला बंदर उन्माद बाद में पहले से कहीं अधिक जटिल और प्रतिरोधी हो गया |

मैंने सबसे पहले सभी जानकारी उपलब्ध की और प्रभावित क्षेत्रों में जा कर लोगों से बात की| मैंने व्यक्तिगत रूप से कम से कम चालीस व्यक्तियों से बात की , जो ये दावा करते हैं कि उन्होंने कुछ देखा और कुछ एसे थे जो भयभीत थे ,जिन्होंने इसके बारे में सिर्फ सुना था | हमने सभी तथ्यों का मूल्यांकन किया और कुछ महत्वपूर्ण सुराग मिले | अधिकांश लोग जो वहां उपस्थित थे ,उनसे बातचीत करने पर पता चला कि उन्होंने भी इस घटना को आँख से नहीं देखा था | जो लोग इस घटना को संभालने का दावा कर रहे थे उन में भी विरोधावास था | इन आँखों देखी घटनाओं के गवाहों से बातचीत के बाद समझते देर नहीं लगी की ये काला बंदर बहुत अलग अलग रूप में था | गवाहों के देखे गए आधार पर एक नहीं पांच अलग-अलग तरह के चहरे बनाये गएp पहले रिपोर्ट में काले बंदर का आकार काफी बड़ा था | उसकी लम्बाई करीब ५-६ फुट थी | उसका चेहरा आदमी के चेहरे के समान था | बाद में यह बंदर ने कपडे भी पहनने शुरू कर दिए |कभी कभी धूप का चश्मा पहने दिखता तो कभी अन्तरिक्ष यात्री की तरह एक बड़ा काला हेलमेट पहने |

यद्दपि यह ३० मीटर तक कूद सकता था , एक छत से दूसरी छत और एक गाँव से दूसरे गाँव जाना उसके लिए आसान सी बात थी फिर भी अपने पैरों के निशान उसने कहीं नहीं छोड़े थे | उसकी छाती पर बल्ब जलते दिखते थे और उसका हाँथ कृत्रिम पंजों के साथ हथियारों से लैस था | एक जानेमाने समाचार पात्र ने प्रस्ताव रखा कि यह किसी अन्य गृह का प्राणी , कोई रोबोट , आदमी या मशीन हो सकता है | लेकिन यह अँधेरे का प्राणी था, अगर कोई उसके ऊपर रौशनी डालता तो वह हवा में गायब हो जाता है| लोगों ने यह भी बताया कि जब वह आक्रमण करता है, तो इसका आकर बदल जाता है | कई बार यह बिल्ली , कभी बड़े पंख वाला पक्षी भी बन जाता था | धीरे- धीरे यह स्पष्ट होता जा रहा था काला बंदर पूरी तरह से एक काल्पनिक उत्पाद है | जो टीवी में एक धारावाहिक की तरह लोकप्रिय होता जा रहा है | उसकी कहानी हनुमान से लेकर बेटमेन तक लोकप्रिय होती जा रही थी |

काला बंदर उन्माद एक बड़े पैमाने पर भ्रम था | काला बंदर का कोई अस्तित्व नहीं था बल्कि कुछ मतिभ्रम समूहों और उन्माद मानसिकता की प्रवृत्ति के लोगों की एक कल्पना मात्र थी | जब छोटे या बड़े समूह डर और आंतक से भर जाते हैं तो यह उन्माद महामारी का रूप ले लेता है | और फिर एक बिल्ली, एक आवारा बंदर, एक पेड़ की टहनी या एक डरे हुए व्यक्ति की चीख ,एक चलती छाया ये सारी घटनाएँ किसी भी समूह को उत्तेजित कर सकती हैं |

बहुत सारे लोग एक दिशा निर्देश का इंतजार कर रहे थे | काला बंदर के बारे में मेरी स्पष्ट राय सुनकर वहाँ एक राहत का माहौल था | ज्यादातर लोग मेरी बात से पूरी तरह सहमत नहीं थे और पूरी तरह से हमारी स्थिति को स्वीकार करने में हिचक रहे थे,लेकिन जनहित के लिए ये जरुरी था | इसलिए दूसरे दिन सारे अखवारों ने मेरी बात को वजन दिया और अगले ही दिन अंग्रेजी और हिन्दी के सभी प्रमुख टीवी चैनलों में साक्षात्कार के लिए बुलाया | उनमें से कुछ चैनल अपने कार्यक्रम में मेरे बयान को हर घंटे दोहरा रहे थे | एक बड़ी रहत नज़र आ रही थी | काला बंदर उन्माद धीरे धीरे घटता जा रहा था |

लेकिन दूसरी तरफ एक समूह ऐसा था जो विभिन्न पक्षों से इसे बड़े पैमाने पर उठाने का प्रयास कर रहे थे | कुछ टीवी चैनलों के लिए बूम का समय था | उनकी कैमरा टीम गावों और उपनगरों के आसपास निगरानी कर रही थी कि कोई उत्तेजित खबर या गवाह या पीड़ित से इन अफवाहों को प्रोत्साहित करने का मौका मिल जाये | पुलिस कार्रवाई भी नाटकीय रूप से काम कर रही थी | उसने अपने हजार अतिरिक्त पुलिसकर्मियों को उस जगह की निगरानी के लिए रखा था ,जो रात को गश्त लगाती थी जिसे रात में देखते ही गोली मारने के आदेश थे | कई नेता लोग ने अपने क्षेत्रों को बचाने के लिए सेना की भी सहायता मांगी | मीडिया के एक वर्ग को पैसे भी मिल रहे थे जिन्होंने ये बताया कि काला बंदर आदमी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के एक एजेंट है |,

जैसे ही इस बात पर जोर दिया गया कि यह काला बंदर के रूप में एक राक्षस है,पहले से ज्यादा हमले के मामले सामने आने लगे | मीडिया भी उसके पंजे और नाखूनों से लगे घावों और खरोंच को प्रस्तुत करने लगा | तरह तरह के सबूत भी दिखाए जो इस बात को दर्शाते थे की वहां जरुर कुछ है | पुलिस ने भी उनके तीन हजार अतिरिक्त बलों को नियुक्त कर बताया की वो भी इस घटना से जुडी है और गंभीरता से ले रही है | अतिरिक्त विशेष कार्य बल हतियारों से लेस तेजी से वाहनों में घूम रही थी जैसे काला बंदर विशाल गति के साथ दौड़ रहा हो | काला बंदर से मुठभेड़ की खबर लगभग एक ही समय में अलग अलग जगह से आ रही थी |

हम भी पीड़ितों को देखने के लिए वहां पहुंचे | करीब से देखने पर अधिकांश मामलों में निराशा ही हाथ लगी | कोई भी गंभीर घाव नहीं थे कुछ छोटी खरोंचों को छोड़ कर जो किसी भी कारण से हो सकते थे लाल खरोंच के निशान थे, जो शायद खाट की रस्सी शरीर में रगड़े से भी हो सकती थे | छोटी छोटी खरोंच के निशान मच्छर के काटने के लग रहे थे| चार लाइन वाले खरोंच शायद खाने वाले कांटे से बनाये गए थे दिलचस्प बात ये है की उनमे कोई भी समानता नहीं दिख रही थी , जबकि दावे के अनुसार ये निशान आने का कारण एक ही था | अधिकांश घाव पैरों पर थे , जो काफी असामान्य बात थी क्योंकि हमलावर की ऊंचाई छह फुट थी | इन सभी मामले में हम आश्वस्त थे कि ये कोई गंभीर घाव नहीं हैं ,ये स्वयं जान - बूझकर या अनजाने में खरोंच लगने से निशान बने हुए थे |

डाक्टरी परिक्षण में भी ये पाया गया की ये घाव किसी मानव या पशु के नाखून नहीं थे | इस तरह की संवेदनशील हालात में किसी भी चोट या खरोंच के निशान आने पर ये मान लिया जाता है की ये काला बंदर के हमले के निशान है | मैं लोंगों को देख कर अनुमान लगा रहा था की लोग किस तरह से काला बंदर हमले का वर्णन कर रहे हैं | उसमे घाव और दर्द से ज्यादा एक उत्तेजना थी , जिसको वे व्यक्त कर रहे थे | चारों तरफ के माहौल और हालात में लोग बिना सच्चाई को जानते हुए अपनी कहानी बना रहे थे| उस कहानी को बताने में कुछ झूठ का साथ ले कर उसकी चरम सीमा पर पहुँच जाते थे और इस तरह एक काल्पनिक संसार बना लेते थे |

अचानक से घटनाक्रम ने एक नया भयावह मोड़ ले लिया | लोग हिंसक हो गए .. दो अलग -अलग घटनाओं में भीड़ ने दो राहगीरों को लाठी और डंडे से पीछा कर उन पर हमला किया | उस दिन उन्हें बेरहमी से मार दिया होता अगर पुलिस उन्हें बचने नहीं आती | उस पीड़ित की सिर्फ़ ये ग़लती थी कि वो एक अंतरिक्ष यात्री की तरह काला हेल्मेट पहने था | यह अवतार उनके काला बंदर के काल्पिनिक वैज्ञानिक संस्करण की तरह था | वहाँ पर इस भीड़ के हमले की वजह से सदमे की लहर थी | लोग डरे और भयभीत थे |

में प्रेस और टीवी साक्षात्कार में दिल्ली पुलिस की आलोचना कर रहा था ,क्योंकि वो इस भ्रम और आतंक को दबाने की जगह इसको बढ़ावा दे रहा था | ३००० खाकी कपड़े वालों को अधिकारिक तौर एक प्रेत को पकड़ने का अधिकार दिया गया था और उनके कारण इस आतंक को और बढ़ावा मिला | पुलिस को इस मामले की गंभीरता से जाँच करना था | पुलिस ने इसकी गंभीरता से छानबीन न करके एक निराधार निष्कर्ष को सबके सामने रख दिया | अगर पुलिस चाहती तो उन घावों खरोंचों की फोरंसिक जाँच कराती और किसी निष्कर्ष पर निकलती और इन सब झुटे दावों को ख़तम करती, लेकिन एसा कुछ भी नही हुआ | मैने लोंगों को शांत किया और समझाया की ये काला बंदर कुछ भी नही है ,सिर्फ़ एक काल्पनिक उत्पाद है | इस विवाद पर उच्च पुलिस अधिकारियों ने कुछ बहाना बनाया | पुलिस में ये एक चर्चा का विषय था | बाद में कुछ हिन्दी चेनलों और समाचार पत्रों ने भी इस मामले को व्यवस्थित रूप से लोगों को शिक्षित किया | पुलिस अधिकारियों ने साक्षात्कार किया और हमारी राय को जानना चाहा | सात घंटे बाद टीवी समाचार में घोषणा की गयी की पुलिस भी बुद्धिजीवी के साथ है और जो लोग इस तरह की अफवाह फैला रहे थे ,उनको गिरिफ्तार करना शुरू कर दिया | इन सभी दावों के लिए फ़ोरेंसिक विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों की एक टीम का गठन हो गया | और इसके बाद वो उस नतीजे पर पहुँचे जिसको हमने कई दिनों पहले ही समझा दिया था | l

हम इस नतीजे से बहुत ही खुश थे | हमारे काला बंदर उन्माद में हस्तक्षेप और पहल से कई लोगों की दिमाग़ और आँख खुल गए थे | उन्होने अधिकारियों को उनके कर्तव्य और ज़िम्मेदारियों को याद दिलाया और कई वैज्ञानिकों को जनता को शिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया | मेरी राय में बुद्धिजीवी संगठन इस तरह हमारे समाज की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं |

काला बंदर उन्माद जिस तरह भारत की राजधानी दिल्ली में व्यापक पैमाने पर फैला हुआ था उससे हम हैरान भी थे और चिंतित भी | इस दौरान कड़ी मेहनत और व्यस्तता के कारण ऐसा महसूस हुआ की एक अग्निकांड को रोकने में सफल रहे पर पीछे देखने पर लगता है की इन आग की लपटों के उपर हमारी जीत हुई है | काला बंदर उन्माद के कारण हमे हज़ारों लोंगों तक पहुँचने का और अपनी बात समझाने का मौका मिला |इस प्रकरण को बुद्धिजीवी क्रेशकोर्स के रूप में देखा जा सकता है की कैसे जन भ्रम को काबू में किया जाता है | ये हमारे लिए एक और मौका था हमारे कार्य के महत्त्व को समझाने का |इसके अनुभव के बाद हम बड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकेंगे |

हिन्दी अनुवादक - दीपाली सिन्हा