RATIONALIST INTERNATIONAL

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guardian.co.uk 18 Mai 2010

एक भारतीय जो धूप पर जीवित है

प्रहलाद जानी जिनका दावा है कि वो वर्षों से अन्न जल ग्रहण किए बिना जीवित हैं,

उनके इस दावे को उन लोंगों ने साथ दिया जो इसकी सच्चाई से अच्छी तरह से वाकिफ़ थे|

सनल एडमरूकु

प्रेसीडेंट
इंडियन रॅशनलिस्ट असोसियेशन & रॅशनलिस्ट इंटरनॅशनल
Prahlad Jani

जब से अंबे माँ ने अपनी उंगली से मेरी जीभ को छुआ है तब से मैने कभी भी खाने और पानी को हाथ नही लगाया है-ये दावा उस व्यक्ति का है जिसका नाम है पहलाद जानी |

जैविक नियमों के अनुसार कोई भी मानव और जानवर भोजन और पानी के नियमित सेवन के बिना जीवित नही रह सकता | उनका यह दावा धर्म से जुड़ा होने के कारण लोकप्रिय हुआ | इस तरह के मामले पहले भी सामने आये हैं, लैकिन पहलाद जानी का मामला इसलिये प्रकाश मैं आया क्यूंकी कई प्रभावशाली लोग उनके साथ थे |

न्यूरोलॉजिस्ट और अहमदाबाद के स्टर्लिंग अस्पताल के प्रमुख डा. सुधीर शाह, पहले व्यक्ति थे जो प्रहलाद जानी की मूर्खतापूर्ण कहानी को सुर्खियों में लाए | सनसनीखेज "वैज्ञानिक" अनुसंधान परियोजना में, वे और उनकी टीम २२ अप्रैल और ६ मई के बीच इस मामले पर चिकित्सा जांच करने पहुँची | इस परियोजना को भारतीय शरीर विज्ञान और संबद्ध विज्ञान रक्षा संस्थान (डीआईपीएएस), रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन की एक शाखा की देखरेख के द्वारा किया गया था | डीआईपीएएस निर्देशक गोविंद स्वामी इलवज़्गन भी डा . सुधीर शाह का साथ दे रहे थे| बाद मैं दोनो ने संयुक्त रूप से इस बात की पुष्टि की, कि १५ दिनों के पर्यवेक्षण के दौरान जानी ने एक अन्न का दाना भी नही खाया और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस दौरान उन्होने पानी की एक बूंद भी नहीं पी - जो पूरी तरह से असंभव लगता है| क्या ये वैज्ञानिक एक एसे आदमी के दावे को, जो जीव विज्ञान के बुनियादी कानूनों को बेबुनियाद साबित कर रहा है, सलामी देंगे? जब जानी अपनी प्यास बुझते थे तब क्या उन्होने अपनी आँखे (पूरे समय सीसीटीवी कैमरा चल रहा था) बंद कर रखी थी? इसमें कोई शक नहीं है कि " संपूर्ण अवलोकन " में कमियां थी और "महान वैज्ञानिक परीक्षण" एक तमाशा था |

जब परीक्षण चल रहा था, मैंने इंडिया टीवी के एक लाइव कार्यक्रम में कुछ खामियों को उजागर किया : एक अधिकारिक वीडियो क्लिप से पता चला कि कभी कभी जानी सीसीटीवी कैमरे के क्षेत्र से बाहर जाया करते थे | क्योकि उन्हे भक्तों से मिलने की अनुमति थी और सूर्य स्नान के समय परीक्षण कमरा छोड़ सकते थे| उनके नियमित रूप से किए गये कुल्ला और स्नान गतिविधियों पर निगरानी ठीक से नही रखी गयी थी |मैने एक बुद्धिवादी विशेषज्ञ दल के साथ परीक्षण व्यवस्था की जाँच करने का अवसर माँगा था ,पर अहमदाबाद से तत्काल कोई भी प्रतिक्रिया नही मिली | अचानक स्टर्लिंग अस्पताल से मुझे आमंत्रित किया गया - लाइव टीवी पर - अगले दिन की प्रक्रिया (परीक्षा) में शामिल होने के लिये |

सुबह जब हम गुजरात के लिए उड़ान भरने तैयार थे, सूचित किया गया कि अभी हमें परियोजना के प्रमुख अधिकारी की अनुमति का इंतजार करना पड़ेगा | और ये कहने की जरूरत नहीं है : कि ये अनुमति कभी नहीं आई |

इसी तरह, हम नवंबर २००३ में डा शाह के प्रथम परीक्षण में भी भाग लेने में असमर्थ रहे थे| डा शाह जिनके पास पहलाद जानी पर किए गये अध्ययनों का एक लंबा रिकॉर्ड है| जिसकी अब तक किसी भी वैज्ञानिक पत्रिका में चर्चा नहीं की गयी है| वे केवल अपने इस धूप सिद्धांत को साबित करने की कोशिश करते रहे : कि मनुष्य खाने और पीने के अलावा किसी अन्य ऊर्जा स्रोतों से भी जिंदा रह सकता है, उसमे से एक है सूरज की रोशनी | प्रहलाद जानी डा शाह का पहला मामला नही था २०००-२००१ में, उन्होने एक वर्ष से भी अधिक समय तक हीरा मानेक पर परीक्षण किया था और अपने दावे की पुष्टि की, कि वह सिर्फ़ धूप ख़ाता है(और कभी कभी थोड़ा सा पानी)| शाह के इस अनुसंधान को नासा और पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय द्वारा जांच किया गया था| जिसको अधिकारिक तौर पर अस्वीकार कर दिया था |

डा. शाह कट्टर जैनी थे और भारतीय जैन डाक्टर 'फेडरेशन (ज्ड़फ), के अध्यक्ष भी थे| उन्होने यह प्रस्ताव रखा कि भगवान महावीर की ' महाविज्ञान ' द्वारा चिकित्सा तथ्यों को अत्याधिक बारीकी से प्रकट किया गया है, और अनुसंधान के द्वारा जैन धारा के अंतर्गत उसी दिशा में अपूर्ण चिकित्सा विज्ञान पर कार्य किया जा सकता है| हमे केवल आश्चर्य ये है कि धार्मिक आस्था के कारण क्या उनकी शोधकर्ता आँखों के आगे कभी कभी बादल घिर जाते हैं | दिलचस्प है, उनकी टीम के कई सदस्य जैनी हैं , और हीरा मानेक परीक्षण में भी उनके साथी ज्ड़फ के एक पूर्व अध्यक्ष थे|

शाह ने यह भी सुझाव दिया कि यह धूप सिद्धांत संभवतः सेनिकों के लिये उपयोगी हो सकता है | और ये शर्म की बात होगी कि भारतीय रक्षा मंत्रालय इस सुझाव को मान लेगी |क्या हम सेना को धूप आहार देने पर विचार करने लगेगें | ये जानने के लिए हम भी इच्छुक हैं |

हिन्दी अनुवादक : दीपाली सिन्हा