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फतवे की छाया में रुश्दी

Salman Rushdie

तेईस साल पहले २४ फ़रवरी सन १९८९ में ईरान के अयातुल्ला खोमैनी ने "द सेटेनिक वर्सेज"के लेखक सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा जारी किया |ये कोई नयी बात नहीं थी की किसी लेखक की पुस्तक पसंद न आने पर धार्मिक नेताओं ने उसे हत्या का आदेश दिया हो | कई बार पसंद के अलावा भी दूसरे कारण होते थे |ये भी हो सकता है की खोमैनी को उस पुस्तक के बारे में इतनी जानकारी भी न हो ,लेकिन अगर उसे ये अहसास होता है की इस पुस्तक से उसकी देश में छवि बिगड़ेगी और जनता उसे नापसंद करने लगेगी तब भी इस तरह हत्या की घटनाएँ होती थी | ये घटनाएँ सिर्फ इस्लाम में नहीं होती हैं ,ईसाइयों का इतिहास भी खोमैनियों से भरा है| ईसाई धर्म में जिन पुस्तकों को पढने की अनुमति नहीं है ,उसकी एक सूची है और इस धर्मं के लोग इसके खिलाफ कोई काम करते हैं तो उसे जिंदा जला दिया जाता था | इस तरह का कट्टर धर्म किसी भी बौधिक पक्ष का सामना नहीं कर सकता है | धर्म नेतओं का आदेश ही अंतिम निर्णय रहता है| इसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिए कठोर सरंक्षण की जरुरत होती है|

इस फतवे के बारे में नयी बात यही थी की इस बार ईरान के नेता का प्रतिबंध अपने देश की सीमाओं से परे था ,वो भी एक मुस्लिम व्यक्ति के लिए | इस तरह से वो उदार पश्चिम देशों में कब्जा कर अपनी तानाशाही का क्षेत्र बड़ा रहे थे | अगर रुश्दी एक ईरानी लेखक होते और ईरान में रह रहे होते तो उनकी हत्या के फतवे को अनदेखा कर दिया होता | लेकिन लंदन में एक ब्रिटिश नागरिक होने के नाते उन्हें माफ़ नहीं किया जा सकता था |उनकी अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर सवाल उठाया जाय तो , इस पर सभी की राय भिन्न-भिन्न हो सकती है | रुश्दी एक शर्मनाक मामला है जिसने ये साबित कर दिया कि आज भी प्रबुद्ध दुनिया और महानगरों में धर्म नियंत्रण कितनी गहराई से समाया हुआ है | विश्व में आज भी मानव अधिकार कितने अस्थिर और कमजोर हैं | सांस्कृतिक सापेक्षतावाद के प्रचारक अपने खतरनाक विचारों को प्रचार करने का मौका ढूढ़ ही लेते हैं | उन्होंने ये प्रस्ताव रखा कि धार्मिक कट्टरपंथियों को ऐसे लोगों को मारने की अनुमति मिलनी चाहिए नही तो यह उनकी संस्कृति को मार देंगे |

तेईस साल बाद आज भी उस फतवे कि आवाज उसी तरह गूंज रही है भारत भी एक शर्मनाक उदाहरण है ,जो रुश्दी कि जन्म भूमि और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है ,जहाँ चुनाव के दौरान आज भी "द सेटेनिक वर्सेज" प्रतिबंधित है और वो लेखक यहाँ अस्तित्वहीन हो जाता है| जनवरी में जयपुर साहित्य उत्सव में राजस्थान सरकार ने विचित्र परिस्थितियों में रुश्दी को भाषण न देने पर मजबूर किया | उत्तर प्रदेश में चल रहे चुनावी माहौल में १८ फीसदी मुस्लिम वोट के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों में प्रतिस्पर्धा थी| सभी राजनैतिक दल अलग अलग तरीके से समझौते में लगे थे |सभी का एक ही मकसद था कि इस मुद्दे को कम से कम उठाया जाय, क्योंकि यह मुद्दा किसी भी राजनैतिक दल के लिए फायदेमंद नहीं था | इस बीच चार साहसी लेखकों ने जयपुर में "द सेटेनिक वर्सेज"पढ़कर रुश्दी के साथ उनकी एकजुटता व्यक्त करने की कौशिश की ,जिनके खिलाफ पुलिस ने जांच शुरू कर दी है |

हिंदी अनुवादक - दीपाली सिन्हा